नेशनल नैपकॉन 2025 के उपलक्ष्य में वाकाथन का आयोजन,  प्रदेश के छाती रोग विशेषज्ञ डॉक्टर ने इस आयोजन में लिया भाग।

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पटना, 9दिसंबर 25

आज पटना गांधी मैदान एरिया में नेशनल नैपकॉन 2025 के आयोजन से पहले डॉक्टर द्वारा वाकाथन का आयोजन किया गया।

इस अवसर पर इंडियन चेस्ट समिति के प्रेसिडेंट डॉक्टर सुधीर कुमार ने कहा कि इस तरह का आयोजन बिहार में पहली बार होने जा रहा है इस कार्यक्रम में 3000 से अधिक देश एवं विदेश के छाती रोग विशेषज्ञ डॉक्टर कार्यक्रम में शामिल होंगे।

 

नैपकॉन 2025 का आयोजन 11 से 14 दिसंबर को पटना के ज्ञान भवन में आयोजित किया जाएगा, जिसका उद्घाटन बिहार के माननीय राज्यपाल द्वारा किया जाएगा इस समारोह में राज्य के स्वास्थ्य मंत्री श्री मंगल पांडे भी उपस्थित थे रहेंगे।

इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य फेफड़ों की बीमारियों से संबंधित नवीनतम शोध, दवाइयां ,तकनीक के उपचार पद्धतियों की जानकारी बिहार के डॉक्टर तक पहुंचना है।

इस दौरान अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ वर्कशॉप और प्रशिक्षण भी प्रदान करेंगे जिससे चिकित्सा सेवाएं और अधीक उन्नत और प्रभावी हो सकेंगे।

डॉक्टर सुधीर ने बताया कि नैपकॉन इंडियन चेस्ट सोसाइटी और नेशनल कॉलेज ऑफ चेस्ट फिजिशियन द्वारा आयेजित एक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मेडिकल कॉन्फ्रेंस है. जो वर्ष 1999 से नियमित रूप से आयोजित की जा रहे है। यह 27वां संस्करण है और पहली बार बिहार इसकी मेजबानी कर रहा है

विशेषज्ञों के अनुसार कोविड-19 के बाद छाती से जुड़ी बीमारियों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। वायरस में तेज़ म्यूटेशन और जलवायु परिवर्तन इस वृद्धि के प्रमुख कारण हैं। पहले जो वायरस सिर्फ जानवरों में पाए जाते थे अब वे मनुष्यों को भी संक्रमित कर रहे हैं।

उन्होंने बताया कि बढ़ते वायु प्रदूषण के कारण अस्थमा, सीओपीडी और फेफड़ों के कैंसर के मामलों में तेजी आई है। साथ ही टीबी और निमोनिया भी गंभीर स्वास्थ्य समस्या बने हुए हैं। एंटीबायोटिक्स के गलत या अधिक उपयो से बैक्टीरिया दवाइयों के प्रति रेसिस्टेंट हो रहे हैं, जिससे उपचार चुनौतीपूर्ण बन रहा है।

 

डॉक्टर ने स्वीकार किया कि भारत में टीबी अभी भी बड़ी चिंता का विषय है। सरकार द्वारा 2025 तक टीबी भारत का लक्ष्य निर्धारित किया गया था, परंतु वह लक्ष्य अभी कही दूर है।

 

टीबी नियंत्रण में सबसे बड़ी बाधा है जागरूकता की कमी और जधरा इलाज छोड देना. जिसके कारण दवा के मामले बढ रहे हैं। इसके साथ ही दवाइयों की आपूर्ति में बाधाएँ और नई प्रतिरोधी (MDR एवं XDR) टीबी के दवाइयों के विकास की धीमी गति भी स्थिति को और चुनौतीपूर्ण बना रही है।

उन्होंने बताया कि विदेशों में उपचार तकनीकी रूप से उन्नत है, लेकिन वहाँ इलाज बहुत महंगा है और अक्सर अपॉइंटमेंट व जांचों के लिए लंबा इंतज़ार करना पड़ता है।

 

इसके विपरीत, भारत में इलाज अधिक सस्ता, सुलभ और व्यापक स्तर पर उपलब्ध मेडिकल कॉलेजों और सरकारी योजनाओं- विशेषकर आयुष्मान भारत की वजह और दवाइयाँ कम खर्च पर मिल जाती हैं।

 

डॉक्टर ने फेफड़ों को स्वस्थ रखने के लिए कुछ महत्वपूर्ण उपाय बताएः

 

नियमित व्यायाम, योग और प्राणायाम,प्रदूषण वाले क्षेत्रों में N95 मास्क का उपयोग ,हर वर्ष फ्लू वैक्सीन और जरूरत अनुसार निमोनिया वैक्सीन लेना एवं जीवनशैली में शारीरिक सक्रियता और स्वच्छ पर्यावरण बनाए रखने से फेफड़ा स्वस्थ रहेगा

 

नैपकॉन 2025 न सिर्फ चिकित्सकों के लिए ज्ञानवर्धक मंच है, बल्कि यह बिहार के स्वास्थ्य ढाँचे और फेफड़ों से संबंधित चिकित्सा सेवाओं के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर भी है। विशेषज्ञों का मानना है कि जागरूकता, सही इलाज और वैज्ञानिक दृष्टिकोण ही फेफड़ों की बीमारियों पर नियंत्रण की दिशा में सबसे बड़ा कदम है।

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