भारत के राजनीतिक बन्दियों को आज़ाद करो:CPI 

 

 

नई दिल्ली, 5 जनवरी 2026.

सुप्रीम कोर्ट ने आज गुलफिशां फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को ज़मानत देते हुए, उमर खालिद और शरजील इमाम को ज़मानत देने से इनकार कर दिया है। यह बेदह चौंकाने वाला फैसला है। कोर्ट ने कहा है कि उनके खिलाफ यूएपीए के तहत प्रथम दृष्टया मामला साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत हैं। कोर्ट ने उन्हें एक साल बाद या प्रोटेक्टेड गवाहों की गवाही के बाद, जो भी पहले हो, अपनी ज़मानत याचिकाएं फिर से दायर करने की “इजाज़त” दी है!

 

बिना मुक़दमे के पांच साल से ज़्यादा हिरासत में रखने के बाद उमर खालिद और शरजील इमाम को ज़मानत न देना, न्याय और भारतीय नागरिकों की संवैधानिक स्वतंत्रता के सिद्धांत का खुला निषेध है। हम भारत की लोकतांत्रिक जनता से अपील करते हैं कि न्याय की धज्जियां उड़ाने वाली इस घटना के खिलाफ अपना विरोध जाहिर करें।

 

यह न्याय का मखौल बनाने से भी कहीं ज़्यादा गम्भीर बात है; सच तो यह है कि मखौल शब्द भी उनके साथ “न्याय प्रणाली” द्वारा किए गए अत्याचार को व्यक्त करने में नाकाफी है। बिना मुक़दमे के 5 साल से ज़्यादा जेल में रहने के बाद भी उन्हें ज़मानत न देना, इस बात की पुष्टि करता है कि राज्य द्वारा उन्हें जानबूझकर उत्पीड़ित किया जा रहा है। मनगढ़ंत आरोपों में दिल्ली पुलिस द्वारा गलत तरीके से जेल में डाले गए लोगों के खिलाफ खड़े होने में सुप्रीम कोर्ट की यह घोर विफलता है। दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा इन युवा कार्यकर्ताओं और विद्वानों को ज़मानत न देने के बाद, लोगों की नज़रें सुप्रीम कोर्ट पर थीं कि वह नागरिक स्वतंत्रता और असहमति के अधिकार की रक्षा करेगा।

 

यह फैसला कुख्यात आपातकाल के समय के ए.डी.एम. जबलपुर मामले जैसा है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा गांधी सरकार के तानाशाही शासन के आगे घुटने टेक दिए थे। आज का फैसला नागरिक स्वतंत्रता और असहमति के अधिकार की रक्षा करने में न्यायालय की विफलता को दर्शाता है। आज सुप्रीम कोर्ट खुद कटघरे में है, जिसने आज के आदेश से स्वयं को ही दोषी ठहरा दिया है। अब यह देश की जनता पर निर्भर है कि वह लोकतांत्रिक संस्थाओं के इस पतन के खिलाफ आवाज़ उठाए और देश में संवैधानिक मूल्यों को बहाल करे

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *