बेलागाड़ा में कुदरत का कहर: ओलावृष्टि ने रौंदे किसानों के सपने, 17 एकड़ फसल बर्बाद कर छोड़ी तबाही की सफेद चादर

बेलागाड़ा में कुदरत का कहर: ओलावृष्टि ने रौंदे किसानों के सपने, 17 एकड़ फसल बर्बाद कर छोड़ी तबाही की सफेद चादर

घाघरा (गुमला): घाघरा थाना क्षेत्र के बेलागाड़ा गांव में बीती रात आसमान से बरसी आफत ने किसानों की कमर तोड़ दी है। चंद मिनटों की ओलावृष्टि ने 17 एकड़ में लहलहाती तरबूज, खरबूज और खीरे की फसल को मटियामेट कर दिया। खेतों में बिछी ओलों की सफेद चादर आज उन किसानों के आंसुओं का गवाह बनी है, जिन्होंने कर्ज लेकर अपनी उम्मीदें बोई थीं।

कुदरत की मार या सिस्टम की बेरुखी?

हर साल आपदा आती है, फसलें बर्बाद होती हैं, लेकिन सवाल वही बना हुआ है—प्रशासन आखिर सोता क्यों रहता है? बेलागाड़ा के किसानों का कहना है कि क्या फसल बीमा और मुआवजा सिर्फ कागजों तक सीमित है? जब आपदा के बाद सर्वे और राहत की बारी आती है, तो प्रशासन की कछुआ चाल किसानों के जख्मों पर नमक छिड़कने का काम करती है।

“सब खत्म हो गया, अब कर्ज कैसे चुकाएंगे?” — पीड़ित किसान

किसान जयहिंद बाड़ा की आंखों का पानी सूख चुका है। उन्होंने रूंधे गले से बताया:

“15 एकड़ में खेती की थी, जिससे 20 मजदूरों के परिवारों की रोजी-रोटी जुड़ी थी। बैंक और साहूकारों से कर्ज लेकर बीज और खाद डाले थे, लेकिन अब सब जमींदोज हो गया। समझ नहीं आता कि परिवार पालें या कर्ज चुकाएं।”

प्रमुख नुकसान और किसानों का आक्रोश

व्यापक बर्बादी: 17 एकड़ में लगी नकदी फसलें (तरबूज, खरबूज, खीरा) पूरी तरह नष्ट।

लाखों का घाटा: फसलों की बर्बादी से किसानों को लाखों का आर्थिक नुकसान हुआ है।

प्रशासन को चेतावनी: गांव के युवाओं और किसानों में भारी उबाल है। किसानों ने सीधे सवाल दागे हैं कि क्या उनकी मेहनत की कोई कीमत नहीं है? मुआवजा योजनाएं जमीन पर क्यों नहीं उतरतीं?

बड़ा सवाल: क्या फाइलों में दफन हो जाएगा यह दर्द?

बेलागाड़ा का यह मंजर चीख-चीख कर इंसाफ मांग रहा है। अब सबकी नजरें जिला प्रशासन और कृषि विभाग पर टिकी हैं। क्या इन अन्नदाताओं को समय पर उचित मुआवजा मिलेगा या हर बार की तरह यह मामला भी सरकारी फाइलों और आश्वासनों के बीच कहीं खो जाएगा?

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